KORBA: PMGSY की सड़क या ‘पापड़’? करोड़ों डकारने का नया खेल उजागर!
मेकअप वाली सड़क, विकास का मजाक

PMGSY की सड़क या ‘पापड़’? करोड़ों डकारने का नया खेल उजागर!
कोरबा, छत्तीसगढ़ —

केंद्र सरकार की योजनाओं को जमीनी स्तर पर कैसे “खाया” जाता है, इसका जीता-जागता उदाहरण कोरबा जिले में देखने को मिल रहा है। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) के तहत बनाई जा रही सड़क अब सड़क कम और ‘पापड़’ ज्यादा लग रही है—इतनी पतली, इतनी कमजोर कि हाथ लगाते ही उखड़ जाए।
नई सड़क नहीं, पुरानी पर मेकअप!

ढिबरीपारा तक बनने वाली 2.5 किलोमीटर सड़क को कागजों में मजबूत और बहुस्तरीय दिखाया गया है, लेकिन हकीकत में पुरानी जर्जर सड़क के ऊपर बस डामर की एक हल्की परत चढ़ा दी गई है। ऐसा लगता है मानो सड़क नहीं, किसी टूटे चेहरे पर मेकअप कर दिया गया हो।


हाथ से उखड़ रही ‘करोड़ों की सड़क’
ग्रामीणों का गुस्सा अब खुलकर सामने आ रहा है। उनका कहना है कि सड़क की हालत इतनी खराब है कि डामर हाथ से ही निकल रहा है। यानी जिस सड़क पर करोड़ों रुपये खर्च होने का दावा है, वो पहली नजर में ही भ्रष्टाचार की कहानी बयां कर रही है।
कागजों में मजबूत, जमीन पर फर्जीवाड़ा
सूचना बोर्ड पर मोटी परतों—GSB, WMM और भारी मात्रा में बिटुमिन—का पूरा गणित दिखाया गया है। लेकिन मौके पर न तो बेस तैयार किया गया, न ही मानक के अनुसार लेयर डाली गई। सब कुछ सिर्फ कागजों में ‘परफेक्ट’ है, जमीन पर सिर्फ धूल और धोखा।

₹1.51 करोड़ की सड़क या ‘लूट का ठेका’?
करीब डेढ़ करोड़ रुपये की लागत से बनने वाली इस सड़क में 14 टन बिटुमिन और सैकड़ों ट्रक सामग्री दिखाकर पैसा निकालने की तैयारी है। लेकिन असलियत यह है कि सामग्री आधी भी इस्तेमाल होती नजर नहीं आ रही। सवाल उठ रहा है—बाकी पैसा गया कहां?
ठेकेदार-इंजीनियर की सेटिंग?
यह काम रायपुर की एक कंस्ट्रक्शन कंपनी द्वारा किया जा रहा है और निगरानी की जिम्मेदारी सरकारी इंजीनियरों की है। फिर भी इतनी घटिया गुणवत्ता कैसे पास हो गई? क्या यह सीधा-सीधा मिलीभगत का मामला है?

आदिवासी इलाके के साथ सबसे बड़ा धोखा
यह सड़क विशेष रूप से कमजोर जनजातीय क्षेत्र के लिए बनाई जा रही है। जहां विकास की सबसे ज्यादा जरूरत है, वहीं इस तरह का भ्रष्टाचार न सिर्फ शर्मनाक है, बल्कि सीधा अधिकारों पर डाका है।
पहली बारिश में बह जाएगा ‘पापड़ रोड’?
जिस सड़क की परत अभी से उखड़ रही है, वह मानसून की पहली बारिश में ही बह जाएगी—यह आशंका अब डर नहीं, हकीकत लगने लगी है।
जांच की मांग तेज, कार्रवाई कब?
ग्रामीण अब सैंपल जांच, क्वालिटी कंट्रोल और दोषियों पर सख्त कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। सवाल साफ है—क्या इस मामले में सिर्फ जांच होगी या वाकई कोई जिम्मेदार भी तय होगा?
आखिर जिम्मेदार कौन?
जब करोड़ों का बजट पास होता है, तो जमीन पर “पापड़ जैसी सड़क” क्यों बनती है? यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि सुनियोजित भ्रष्टाचार की बू दे रहा है। अब देखना यह है कि प्रशासन इस पर चुप्पी साधे रहता है या सच में कार्रवाई करता है।









